Tuesday, May 11, 2010

Tu mujhe soch kabhi

Tu Mujhe Soch Kabhi Yahin Chaahath Hai Meri
Mein Tujhe Jaan Kahoon Yahin Hasrath Hai Meri
Mein Tere Pyar Ka Armaan Liye Baitha Hoon
Tu Kisi Aur Ko Chaahe Kabhi Yeh Khudha Na Karen
Tu Kisi Aur Ko Chaahe Kabhi Yeh Khudha Na Karen

Meri Mehroom Mohabbat Ka Sahaara Tu Hai
Meri Mehroom Mohabbat Ka Sahaara Tu Hai
Mein Jo Jeetha Hoon To Jeene Ka Ishaara Tu Hai
Apne Dil Pe Tera Ehsaan Liye Baitha Hoon
Mein Tere Pyar Ka Armaan Liye Baitha Hoon
Tu Kisi Aur Ko Chaahe Kabhi Yeh Khudha Na Karen
Tu Kisi Aur Ko Chaahe Kabhi Yeh Khudha Na Karen


Say You Love Me Baby..I’Ve Been Waiting For You….Say You Love Me Baby..

Pyar Mein Sharth Koi Ho To Bathaa De Mujhko
Pyar Mein Sharth Koi Ho To Bathaa De Mujhko
Gar Khatha Mujhse Huyi Ho To Bathaa De Mujhko
Jaan Hatheli Pe Meri Jaan Liye Baitha Hoon
Mein Tere Pyar Ka Armaan Liye Baitha Hoon
Tu Kisi Aur Ko Chaahe Kabhi Yeh Khudha Na Karen
Tu Kisi Aur Ko Chaahe Kabhi Yeh Khudha Na Karen


 U can see video with lyrics
http://www.youtube.com/watch?v=UA1IWIvU7W0

Monday, May 10, 2010

My most favorite songs with lyrics

 Milne Ko Nahin Aaye Kuch Aisa Hua Hoga
Ooo… Milne Ko Nahin Aaye Kuch Aisa Hua Hoga
Phursath Na Mili Hogi Mauka Na Mila Hoga
Lonely Nights And Lonely Days Everywhere I Look I See Your Face
Only You Can Take Away This Pain Aye Ye..Now And Forever N Ever N Ever Oh Baby
Lonely Nights And Lonely Days Everywhere I Look I See Your Face
Only You Can Take Away This Pain Aye Ye..Now And Forever...

You’Re The One….. I Know Without You I Cannot Go On Without Your Love…

Kehne Ko Yahaan Kuch Hai, Kehna Ko Wahaan Kuch Hai
Kehne Ko Yahaan Kuch Hai, Kehna Ko Wahaan Kuch Hai
Socho To Bahut Kuch Hai, Socho To Kahan Kuch Hai
Guzre Hue Lamhon Ne Kuch Bhi Na Kaha Hoga
Phursath Na Mili Hogi Mauka Na Mila Hoga

Lonely Nights And Lonely Days Everywhere I Look I See Your Face
Only You Can Take Away This Pain Now And Forever N Ever N Ever Oh Baby
Lonely Nights And Lonely Days Everywhere I Look I See Your Face
Only You Can Take Away This Pain Aye Ye..Now And Forever

Milne Ke Liye Mujhse Ghar Se To Chale Honge
Milne Ke Liye Mujhse Ghar Se To Chale Honge
Jazbaath Ki Shidath Mein Roke Na Ruke Honge
Par Chaand To Matham Tha Rastha Na Mila Hoga
Phursath Na Mili Hogi Mauka Na Mila Hoga

Milne Ko Nahin Aaye Kuch Aisa Hua Hoga
Phursath Na Mili Hogi Mauka Na Mila Hoga
Lonely Nights And Lonely Days Everywhere I Look I See Your Face
Only You Can Take Away This Pain Aye Ye..Now And Forever N Ever N Ever Oh Baby
Lonely Nights And Lonely Days Everywhere I Look I See Your Face
Only You Can Take Away This Pain Aye Ye..Now And Forever...

U can listen this song on youtube to click on following link

http://www.youtube.com/watch?v=X1aVZ6cQNWg

Monday, May 3, 2010

निचले तबके तक पहुंचाएं तकनीक

 एन रघुरामन

बेंगलुरु के पूर्वी इलाके में स्थित राजेंद्र नगर झुग्गी-बस्ती में रहने वाली 32 वर्षीय शांता, जो दूसरों के घरों में खाना पकाती है, महीने में बमुश्किल 1500 रुपए कमाती है। बैंक से पैसा निकालने और जमा करने के लिए शांता मोबाइल का इस्तेमाल करती है। वह अपने इलाके में सात महिलाओं के एक स्व-सहायता समूह की अगुआई करती है और उसने इन महिलाओं को भी साप्ताहिक आधार पर अपने कर्ज का भुगतान मोबाइल से करना सिखाया है।
ये महिलाएं कदाचित ही कभी बैंक या किसी एटीएम पर जाती हैं। शांता अपने बैंक संबंधी तमाम लेन-देन मोबाइल के जरिए ही करती है और उसने अपने पति को वेल्डिंग मशीन दिलाने के लिए बैंक से जो 9000 रुपए का कर्ज लिया था, उसकी किश्त भी इसके जरिए ही भरती है। शांता यहां की उन 100 महिलाओं में शामिल है जो पिछले एक साल से जारी पायलट प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं। यह एक माइक्रो क्रेडिट प्रोजेक्ट है जो मोबाइल के जरिए होने वाले लेन-देन की मदद से चल रहा है।
मुझे बीती सदी का सत्तर का दशक याद आता है जब मैं डाकघर में रेडियो लाइसेंस के लिए भुगतान करने जाता था। मैं सरकार द्वारा अपने यूएमएस वाल्व रेडियो छिन जाने के डर से साल में एक बार रेडियो लाइसेंस की 15 रुपए फीस भरने के लिए लंबी-लंबी कतारों में खड़ा रहता था। बाद में सरकार ने फीस लेना बंद कर दिया क्योंकि उसे 15 रुपए जुटाने के लिए 17 रुपए खर्च करने पड़ रहे थे। ऐसा करने का कोई अर्थ नहीं था।
इसी तर्क को माइक्रो फाइनेंस, माइक्रो बैंकिंग और साप्ताहिक व दैनिक किश्त के संदर्भ में देखें। इन्हें संचालित करना बहुत महंगा होगा क्योंकि जो कर्मचारी झुग्गियों में जाएगा, वह ग्राहकों से एक निर्धारित धनराशि से ज्यादा नहीं जुटा पाएगा और उसका दैनिक वेतन उससे अधिक ही होगा जो ब्याज वह इन छोटे-छोटे ग्राहकों से जुटाएगा। इस विशाल आबादी से व्यवहार करने का सर्वोत्तम तरीका मोबाइल के जरिए बैंकिंग करने का ही है, जो निकटवर्ती एटीएम में पैसा जमा करने के बाद हर व्यक्ति के लिए पर्सनल कियोस्क की तरह काम करते हैं।
हर गरीब व्यक्ति बैंकिंग सेवा का इस्तेमाल करते हुए कर्ज ले सके और किश्तें भर सके, इसके लिए अच्छा होगा कि मोबाइल उसके लिए पर्सनल बैंकर की तरह कार्य करे। जिन इलाकों में बैंक नहीं पहुंच पाते, वहां सूदखोर सिर उठाने लगते हैं। ये सूदखोर एक समानांतर अर्थव्यवस्था चलाते हैं और उनकी ब्याज दरें अनाप-शनाप होती हैं। टेक्नोलॉजी काले धन के प्रवाह को कम कर सकती है और विधिसम्मत पैसे के लेन-देन में मददगार बनते हुए एक नई राह खोल सकती है।

Sunday, May 2, 2010

Khud todo apne records

एन . रघुरमन
क्या आपने कभी डोल्फिन के खेला है ? नहीं तो उसे टीवी पर खेलते हुए जरुर देखा होगा!आपने देखा होगा की कई लोग  कैसे उसे कुछ खिलाते है,पहली बार वे खाने के सामान को उसके पास ले जाते है ,डोल्फिन थोडा उचकती है और खा लेती है!उसके बाद आदमी खाने का सामान थोडा और ऊपर करता है ,डोल्फिन थोडा और ऊपर उछलती है और ले लेती है!उसके बाद और ऊपर!और ऊपर और ऊपर!डोल्फिन लगातार उछलती रहती है !एक जगह जाकर उसके उछलने की उचाई रुक जाती है!यानि डोल्फिन सिर्फ उतना ही उछल सकती है या उछलना चाहती है!
डोल्फिन के साथ एस प्रयोग मे यह दीखता है की वह हर बार अपना ही रिकॉर्ड तोड़ने की कोशिश करती है!उसकी शुरुआत जीरो से होती है फिर हर बार वह अपना ही रिकॉर्ड बनती है और आप चुनोती को ऊपर करते जाते है,वह अपना ही रिकॉर्ड तोडती रहती है!
यही जीवन है,यही प्रगति है,आपको हमेशा अपने रेकॉर्ड्स से लड़ना होता है,अपनी ही चीजों से आगे निकलना होता है.किसी दूसरी डोल्फिन के रेकॉर्ड्स से उसे कोई मतलब नहीं!
काम के साथ भी एसा होना चाहिए ,हर इन्सान को यह कोशिश करनी चाहिए की वह अपना रिकॉर्ड खुद ही तोड़े,उसे उसके लिए नए-२ बेंचमार्क बनाने चाहिए !एक कंपनी के रूप मे आपको सामने नयी-२ चुनोतियाँ रखनी चाहिए,उसे प्रोत्साहित करना चाहिए की पिछली बार तुमने इतना अच्छा काम किया था और एस बार उसे भी अच्छा काम करना होगा,काम हर बार बढता जायेगा ,उस आदमी के उछलने की ऊंचाई भी !एक दिन वह अपनी उम्मीद के मुकाबले कहीं जयादा ऊंचाई तक कूद सकता होगा!और वह अपनी कंपनी के लिए भी नए रेकॉर्ड्स बनाएगा ,कंपनी को भी अपने विकास के लिए यही तरीका अपनाना चाहिए!

Wednesday, April 28, 2010

नए विकल्प होते हैं फायदेमंद

N. Raghuraman

यदि आप कीचड़ भरी मंडी में जाए बिना सब्जी खरीदना चाहते हैं और अपना समय भी बचाना चाहते हैं तो अगले कुछ दिनों में आपके लिए ऐसा करना संभव हो सकता है। सूरत में रहने वाले आक्रोश शर्मा एक ऑनलाइन वेजीटेबल स्टोर लांच करने जा रहे हैं। आप उनकी साइट पर क्लिक कर सब्जियों की दर और उनकी गुणवत्ता के बारे में जान सकते हैं।


आप ऑर्डर कर यह बता सकते हैं कि किस समय अपने घर पर इनकी डिलेवरी चाहते हैं। इसके अलावा यदि अपने बीमार रिश्तेदार या मित्र के लिए कुछ फल भी पैक करवाना चाहते हैं तो आप ऐसा कर सकते हैं और उनका पता साइट पर छोड़ सकते हैं। फल सही समय पर सही शख्स के पास पहुंच जाएंगे।
आक्रोश के दिमाग में यह नया आइडिया पिछले कुछ सालों में वेजीटेबल स्टोर चलाने के बाद आया, जिसका टर्नओवर गत वर्ष एक करोड़ रुपए से ज्यादा हो चुका है।


इस बारे में आक्रोश का कहना है, ‘हम एक ‘हेल्दी गिफ्ट’ विकल्प के तौर पर गिफ्ट-पैकिंग फ्रूट्स एंड वेजीटेबल्स के कांसेप्ट को लांच करने जा रहे हैं।’ उन्हें लगता है कि यह हिट रहेगा, खासकर सूरत के हजीरा इंडस्ट्रियल इलाके में रहने वाले कामकाजी दंपतियों के बीच, जिन्हें रोज ताजी सब्जियां खरीदने के लिए वक्त नहीं मिलता।


आक्रोश अपने कारोबार में यह फर्क इसलिए लेकर आए क्योंकि उन्होंने दूसरे स्टोर्स के साथ होड़ नहीं की, बल्कि उस मंडी और बाजार से होड़ की जहां से 70 फीसदी लोग अपने फल व सब्जियां चुनते हैं।


वह अच्छा बर्ताव करने वाले स्टाफ सदस्य अपने कारोबार में लेकर आए, जो आमतौर पर बाजार में नजर नहीं आते। इस तरह उन्होंने एक सब्जी स्टोर का कायापलट कर दिया, जिसने उन्हें पिछले साल एक करोड़ से ज्यादा का कारोबार दिया। अब आक्रोश अपने इस कारोबार को तार्किक विस्तार देते हुए इसे ऑनलाइन बनाने जा रहे हैं।


आक्रोश कहते हैं, ‘इस तरह के नए कांसेप्ट बाजार में सुधार लेकर आएंगे, जिससे ग्राहकों को बेहतर विकल्प उपलब्ध होंगे।’



फंडा यह है कि..
बढ़ती आबादी और अलग-अलग लोगों की जरूरत के हिसाब से विकल्पों की विविधता कारोबार को आगे बढ़ाने में हमेशा मददगार साबित होती है

Tuesday, April 27, 2010

भिखारी भी हो सकता है ब्रांड एंबेसडर.....

N. Raghuraman


भीख मांगने वाले लोगों को तभी भिखारी कहा जा सकता है जबकि वे दूसरों के सामने अपना हाथ फैलाएं। यदि वे भीख मांगना बंद कर दें तो क्या हम उन्हें भिखारी कह सकते हैं? कतई नहीं। कुछ पल के लिए इस बात को भूलकर हम दूसरे परिदृश्य पर आते हैं। मान कर चलते हैं कि हरेक व्यक्ति ने ट्रेन में सफर किया होगा।


ट्रेन में अक्सर हमारा सामना ऐसे किसी भिखारी से होता है जो लता मंगेशकर या मन्ना डे का कोई गीत ऐसी आवाज में गा रहा होता है, जिसके हम आदी नहीं होते। इस वजह से हम तुरंत इस तथाकथित भिखारी गायक को सिक्का दे देते हैं ताकि वह आगे बढ़ जाए और उसकी अजीब तान से हमारा पीछा छूटे। कई बार हम उसके गीतों का आनंद लेने लगते हैं और हमारे बोरिंग सफर के दौरान भिखारी जो ‘सेवाएं’ देता है, उसके बदले उसे पैसे भी देते हैं।


अब अपनी पहली बात पर आते हैं। आखिर इन भिखारियों को समुचित पोशाक और वेतन देते हुए ब्रांड प्रमोटर्स में तब्दील क्यों नहीं कर दिया जाता, जिससे उन्हें दूसरों के आगे हाथ न फैलाना पड़े। ये भिखारी सब जगह जाकर उन कारपोरेट जिंगल्स को गुनगुनाएं, जो हम अक्सर टेलीविजन स्क्रीन पर सुनते हैं। हमें कमल हासन द्वारा फिल्म ‘सदमा’ में किया गया मंकी एक्ट देखने के लिए पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है। ये भिखारी इस तरह का मंकी एक्ट या किसी और पूर्व-निर्धारित एक्ट का प्रदर्शन वास्तव में कर सकते हैं और इसके लिए कारपोरेट्स द्वारा उन्हें धन दिया जा सकता है।



मैं जानता हूं कि मेरा यह विचार कई लोगों को रास नहीं आया होगा। एक पल के लिए जरा सोचें। चूंकि यह विचार एक भारतीय द्वारा पेश किया जा रहा है, इसलिए हमारी भृकुटियां तन र्गई और हमें लगा कि यह घटिया विचार है। लेकिन यदि मैंने इस गाथा की शुरुआत इस तरह की होती कि एक भिखारी अमेरिका में ब्रॉडवे स्टेशन के बाहर गिटार लेकर खड़ा पिछले तीस साल से गाने गा रहा है।


अब एक प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कारपोरेशन ने अपने कारपोरेट जिंगल्स गाने के लिए उसकी सेवाएं लेनी आरंभ कर दी हैं। यह जानकर हम में से ज्यादातर लोगों की प्रतिक्रिया होती- वाह! वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि पिछले महीने ब्रॉडवे में ऐसा ही एक भिखारी कारपोरेट इमेज प्रमोटर बन गया है।



फंडा यह है कि..
हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम भारतीय भी लीक से हटकर सोचते हुए अनूठे विचार पेश कर सकते हैं, जो हर लिहाज से बेहतर हों।

Monday, April 26, 2010

Funda no. 6 खुद को सवालों के जाल में ना उलझाएँ

अमेरिका में एक शहर की अदालत में मुकदमा चल रहा था। अभियोजन पक्ष के वकील ने अपने पहले गवाह को कठघरे में बुलाया। यह गवाह एक बुजुर्ग महिला थी। वकील गवाह के करीब गया और पूछा- श्रीमती जोन्स, क्या आप मुझे जानती हैं ? इस पर बुजुर्ग महिला ने कहा- क्यों नहीं, मैं तुम्हे अच्छी तरह जानती हूँ। मैं तुम्हे तब से जानती हूँ, जब आप एक लड़के थे। सच कहूँ तो तुमने मुझे बहोत निराश किया है। तुम झूठे, मक्कार और धोकेबाज़ हो। तुमने अपनी बीवी से बेवफाई की है। तुम लोगों के साथ सिर्फ अपना मतलब निकालते हो और महाचुगल्खोर हो। तुम अपने को बड़ा तीसमारखाँ समझते हो, मगर तुम्हारी हैसियत एक मामूली क्लर्क की भी नहीं है। तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा हुआ है। वकील को काटो तो खून नहीं। उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि क्या किया जाये ? उसने अदालत कक्ष के दूसरे सिरे की ओर इशारा करते हुए पूछा- क्या आप बचाव पक्ष के वकील को जानती हैं ? उस महिला ने जवाब दिया बेशक। मैं मिस्टर ब्रैडली को जब वह एक छोकरा था, तब से जानती हूँ। वह महा सुस्त, धर्मांध और पियक्कड़ है। उसकी किसी से नहीं पटती। पट भी नहीं सकती। पूरे राज्य में उस जैसा बेकार वकील मैंने अपनी जिंदगी में नहीं देखा, इस बात कि चर्चा करनी ही फिजूल है, कि इसने तीन-तीन महिलाओं के साथ गुलछर्रे उड़ाए और इस तरह अपनी बीवी को बेचारगी और लाचारी की हालत में छोड़ दिया। जिन महिलाओं के साथ इसने नाजायज़ संबंध जोड़े, उनमे से एक तुम्हारी बीवी थी। बचाव पक्ष का वकील तो यह सब सुनकर करीब-करीब मर ही गया। आखिरकार जज ने दोनों वकीलों को अपने पास बुलाया। उसने दोनों के कानों में फुसफुसाते हुए, मगर बेहद गुस्सैल अंदाज़ में कहा- तुम दोगले वकीलों में से किसी ने अगर उस महिला से पूछा कि क्या वो मुझे जानती है, तो मैं तुम दोनों को अदालत की मानहानी के आरोप में जेल में डाल दूंगा। बहरहाल,

किसी कंपनी के संदर्भ में यहाँ फंडा यही है कि बोर्ड रूम कि बैठक में अपने स्टाफ से ऐसा सवाल न करें जिससे आप मुसीबत में फंस जाएँ।